सरकार को दोष देना बंद कीजिए: सरकार जनता का आईना है

हमारे समाज में जब भी कोई समस्या सामने आती है—चाहे वह बेरोज़गारी हो, भ्रष्टाचार हो, महँगाई हो या विकास की कमी—सबसे आसान काम होता है सरकार को दोष देना। आलोचना करना लोकतंत्र का अहम हिस्सा है, लेकिन हमें यह भी समझना चाहिए कि सरकार कोई अलग सत्ता नहीं है जो बाहर से हम पर थोप दी गई हो। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार जनता की ही परछाई है, जनता के विचारों, भावनाओं और प्राथमिकताओं का प्रतिबिंब है।

लोकतंत्र में सरकार जनता से अलग नहीं

लोकतंत्र की असली परिभाषा है—“जनता के लिए, जनता द्वारा, जनता की सरकार।” नेता आकाश से नहीं उतरते, वे उसी समाज से आते हैं जहाँ हम रहते हैं। चुनाव में वही नेता जीतता है जो जनता की सोच और भावनाओं को छू ले। अगर जनता अल्पकालिक लाभ चाहती है, तो सरकार सब्सिडी और फ्री योजनाएँ लेकर आती है। अगर जनता जाति, धर्म या समुदाय के आधार पर वोट करती है, तो राजनीति भी उसी आधार पर खड़ी होती है।

राजनीतिक पार्टियाँ अपने घोषणापत्र जनता की माँग के अनुसार बनाती हैं। चाहे वह मुफ़्त बिजली हो, राशन हो या कर्ज़ माफी—ये सब योजनाएँ इसलिए बनती हैं क्योंकि लोग इन्हें चाहते हैं।

समाज जैसा होगा, वैसी ही होगी सरकार

अक्सर कहा जाता है कि सरकार भ्रष्ट है। लेकिन भ्रष्टाचार केवल मंत्रियों और अफ़सरों तक सीमित नहीं है। यह हमारी रोज़मर्रा की आदतों में भी मौजूद है—जब हम जुर्माना देने से बचने के लिए रिश्वत देते हैं, जब काम जल्दी कराने के लिए “सिफ़ारिश” ढूँढते हैं। अगर समाज भ्रष्टाचार को सामान्य मान ले, तो उसी समाज से निकले नेता उससे अलग कैसे हो सकते हैं?

ठीक इसी तरह, जब समाज जाति और धर्म के आधार पर सोचता है, तो राजनीति भी उसी आधार पर चुनाव लड़ती है। नेता वही बोलते हैं, जो जनता सुनना चाहती है।

जनता वही पाती है, जो वह माँगती है

इतिहास गवाह है कि सरकारें वही करती हैं जिसकी माँग सबसे ज़्यादा होती है। जब जनता रोजगार गारंटी या मुफ्त राशन माँगती है, सरकार उसे लागू करती है। जब जनता पारदर्शिता और जवाबदेही की माँग करती है, तब सूचना का अधिकार (RTI) और डिजिटल सेवाएँ लागू होती हैं।

सीधी बात यह है कि सरकार जनता की सोच और प्राथमिकताओं के अनुसार चलती है। अगर लोग दीर्घकालिक विकास चाहते हैं, तो सरकारें उसी दिशा में नीतियाँ बनाती हैं।

ज़िम्मेदारी साझा है

लोकतंत्र में केवल सरकार दोषी नहीं होती। यह दो-तरफ़ा व्यवस्था है। अगर जनता ईमानदार नेताओं को चाहती है, तो उसे ख़ुद भी ईमानदारी अपनानी होगी।

  • अगर हम भ्रष्टाचार रहित शासन चाहते हैं, तो पहले हमें ख़ुद रिश्वतखोरी से बचना होगा।
  • अगर हम स्वच्छ पर्यावरण चाहते हैं, तो अपनी आदतें बदलनी होंगी।
  • अगर हम जाति और धर्म से ऊपर उठकर राजनीति देखना चाहते हैं, तो वोट करते समय हमें भी वही सोचना होगा।

वैश्विक उदाहरण

यह नियम केवल भारत तक सीमित नहीं है। अमेरिका में जिन नेताओं ने नौकरी और प्रवास जैसे मुद्दों को उठाया, वे इसलिए लोकप्रिय हुए क्योंकि वही जनता की चिंता थी। यूरोप में राष्ट्रवाद और प्रवासन पर राजनीति इसलिए बढ़ी क्योंकि लोगों की सोच उसी दिशा में झुकी हुई थी। सरकारें हमेशा जनता की भावनाओं को ही दर्शाती हैं।

बदलाव की शुरुआत कहाँ से होगी?

अगर हमें दूरदर्शी और विकासशील सरकार चाहिए, तो हमें लगातार उसी की माँग करनी होगी। कठिन सुधार—जैसे आर्थिक नीतियाँ, शिक्षा सुधार, या पर्यावरण संबंधी कदम—तब ही सफल होंगे जब जनता उन्हें अपनाने और सहने के लिए तैयार होगी।

मतलब, केवल आलोचना से बदलाव नहीं आएगा। जनता को मतदान में समझदारी दिखानी होगी, नीतियों का समर्थन करना होगा और रोज़मर्रा की ज़िंदगी में भी वही मूल्यों को अपनाना होगा, जिसकी उम्मीद वह नेताओं से करती है।

निष्कर्ष

सरकार को केवल दोष देना अधूरा दृष्टिकोण है। सरकारें बाहर से थोपी नहीं जातीं, वे हमारे ही समाज से निकलती हैं। वे हमारी सोच, हमारी माँग और हमारी कमज़ोरियों का प्रतिबिंब हैं। अगर हमें अच्छी सरकार चाहिए, तो पहले हमें अच्छे नागरिक बनना होगा।

आख़िरकार, लोकतंत्र में सरकार और जनता अलग नहीं हैं। सरकार “वे” नहीं है, सरकार “हम” हैं। जब तक हम इस सामूहिक ज़िम्मेदारी को नहीं समझेंगे, तब तक असली बदलाव संभव नहीं है।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. सरकार को हर समस्या के लिए दोष देना क्या सही है?

नहीं। लोकतंत्र में सरकार जनता की सोच और प्राथमिकताओं का प्रतिबिंब होती है। सरकार वही करती है जिसकी जनता से सबसे ज़्यादा माँग होती है।

2. अगर सरकार भ्रष्ट है, तो क्या इसका मतलब जनता भी भ्रष्ट है?

सीधे शब्दों में हाँ। भ्रष्टाचार केवल नेताओं या अधिकारियों तक सीमित नहीं है। यह समाज में भी मौजूद है—जैसे रिश्वत देना, नियम तोड़ना या सिफारिश का इस्तेमाल करना।

3. सरकार जनता की सोच को कैसे दर्शाती है?

राजनीतिक पार्टियाँ चुनाव से पहले जनता की माँग और प्राथमिकताओं को समझती हैं और उसी आधार पर घोषणापत्र व नीतियाँ बनाती हैं। अगर जनता मुफ्त योजनाएँ चाहती है, तो सरकार वही देती है। अगर जनता विकास और पारदर्शिता चाहती है, तो सरकार सुधार लाती है।

4. क्या केवल सरकार बदलने से समाज बदल सकता है?

नहीं। समाज को बदलने के लिए नागरिकों को अपनी आदतें और सोच बदलनी होगी। सरकार तभी बेहतर होगी जब नागरिक अपनी जिम्मेदारी निभाएँगे।

5. बेहतर सरकार पाने का असली तरीका क्या है?

बेहतर सरकार के लिए हमें:

  • वोट सोच-समझकर डालना होगा।
  • ईमानदारी और जिम्मेदारी से जीवन जीना होगा।
  • जाति-धर्म की राजनीति से ऊपर उठकर विकास और नीतियों को प्राथमिकता देनी होगी।

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